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Friday, 2 December 2016


अधूरी कविता 

कविता लिखी
एक चिड़िया की , बचपन की
यादो की,
कल की जो सुकूँ देता है
उस कल की भी जो सुकूँ देगा
अहसासों की भी जो पले बढ़े मेरे अंदर
और फिर याद आई वो
जो बनाये रखती है एक गोला सा
इन सब के बाहर
देती है चुनौती छू लेने की
और दूर तलक भगाती है मुझे
आखिर थक के बैठता हूँ और पाता हुँ खुद को
एक नई जगह नए अहसासों के साथ
वो चाहती है कविता अपने लिए मेरे अहसासों से
कोशिश करता हूँ पर नहीं छू पाता उसे
और रह जाती है कविता अधूरी.............  

1 comment:

मैं जकड़ा हुआ हूँ  जब भी कुछ अलग करना हो  या नया  फिजूल  शख्स दिखते हैं  कि बे क्या कहेंगे  मैं आज़ाद नहीं हूँ   मैं जकड़ा ...