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Sunday, 13 May 2018




मैं जकड़ा हुआ हूँ 
जब भी कुछ अलग करना हो 
या नया 
फिजूल  शख्स दिखते हैं 
कि बे क्या कहेंगे 
मैं आज़ाद नहीं हूँ 
 मैं जकड़ा हुआ हूँ। 




Sunday, 8 April 2018


बूची की दुकान  

कभी बचपन की
बड़ी ख्वाहिशों को पूरा करती
वो एकलौती दुकान
हाथ में चवन्नी आते ही
बस  पुरे जोश से भाग दिया करते
मैं ही नहीं, हर तरफ से
और वो उतने ही जोश से
हमारी पसंद को पूरा करता
जाने कैसे जानता था वो
सभी बच्चो के मम्मियों के नाम
जिससे हमें चिढ़ थी
और वो उन टॉफियों को
जो अक्सर पारले की हुआ करती
हमारी नन्ही हथेलियों में लगभग
खोंस देता था
कस कर पकडे हुए हम
उन्हें घर आकर खोलते
और पसीज चुके हाथो से
उन्हें निकाल उनका भरपूर आनंद लेते
सोचते काश हम दिनभर वही बैठे रहें
वक़्त बदला दुकानें भी बढ़ी
शायद और भी अच्छी अच्छी
पर वो दुकान जैसे बचपन ही बन गई
फिर और वक़्त गया और बचपन भी कही खो गया
पर उधर से निकलते गाहे बगाहे
नजर चली ही जाती
लगता जैसे कोई ओटक से टकटकी लगाए है
कुछ हिल सा जाता
वक़्त परिंदा है
कहा रुकता है
कुछ दिन पहले उधर से फिर गुजरा
पता चला बूची नहीं रहा
लगा कोई किरदार मर गया
अपने बचपन का
दिल बैठ गया
आखें छलछला उठी
जिसने बचपन गुलजार किया
वो अब नहीं रहा
बच्चा होता तो शायद खुलकर रोता भी
नजर गई उसी जगह की तरफ
अब एक नई दुकान बन गई थी
इधर उधर देखा
और आगे बढ़ गया
बचपन को रोता छोड़कर। ........






Thursday, 15 March 2018




जा रही थी वो
हमेशा के लिए
मुझसे दूर
शादी थी उसकी
मैं चुप था
हमेशा की तरह
जाने किसका लिहाज
जाने कैसा डर
बहुत दुखी
परेशान
खड़ा था चौराहे पर
देख रहा था
उसे जाते हुए
परिवार के साथ
कही दूर
जहाँ उसकी शादी थी
गाडी में बैठी वो
बेबस और दुखी
मुझे देख रही थी
वो शायद आखिरी पल
और ताउम्र बिछडन
चले गए वो
लगभग शून्य था मैं
बस की गिरने ही वाला
रोक न पाया और अचानक
भाग चला
जितनी तेजी से
भाग सकता था
बिना देखे बिना सोचे
रस्ते में लोग मिले
पर उनका कोई लिहाज नहीं आज
बस रोये जा रहा था 
वो सब मिले
जिनसे मैं डरता रहा
कुछ बोलना था उनसे
पर बस चिल्लाता
और रोता
शायद सब समझते थे वो
या कुछ भी नहीं
वो मूक और नकाब पहने
भाव शून्य चेहरों से देखते
और आगे बढ़ जाते
कुछ पलों में लगा
जैसे सैकड़ो से मिला
जिनसे मुझे फर्क पड़ता था
पर उन्हें
कोई फर्क न पड़ा
और फिर में कही था
शायद वो मेरा घर था
वो सभी थे
जो अपने थे
जैसे इंतजार था उन्हें
मेरा
मैं लिपट गया
बारी बारी
रिरियाने लगा
रोक लें उसे
जा रही है वो
हमेशा के लिए
अफ़सोस
और हतप्रभ भी
वो ही भाव शून्यता देखकर जो
उन सेकड़ो लोगों पर थी
अचानक
सब गायब
सब कुछ
न लोग न घर
मैं अकेला केवल अकेला
और फिर लगा
जैसे उड़ रहा  हूँ
या की गिर रहा हूँ
चिल्लाया
और लगभग हांफते हुए
मेरी नींद खुली
लाइट बंद थी
बिस्तर पर पड़ा था
मोबाइल देखा
रात के ढाई बजे थे
एक लम्बी गहरी  सांस ली
गला सूखा था
सर्दी भी लग रही थी
खिड़की के बाहर  कूलर में
कबूतर के बच्चो की खटपट
सुकून दे रही थी
की मैं अकेला नहीं था
बहुत स्याह रात थी
साढ़े पांच बज गए
खुद को भरोसा दिलाने में
की ये केवल स्वप्न था
भयावह स्वप्न।










Sunday, 31 December 2017

क्या उसने कहा था
की जब न हो साथ ज़माने का
और न बने बात मनाने से
तो तुम उसे छोड़ देना
क्या उसने कहा था कि
बेशर्त प्यार है
कोई चाह नहीं
सिर्फ इसीलिए, मजबूरी हो
तो ये रास्ता देख लेना
तुम उसे छोड़ देना
क्या उसने कहा था
की इन्तजार सिर्फ मैं करुँगी
तुम्हारे आने तक
उस चौराहे पर बैठे हुए
तुम आकर एकदम नजदीक
उस पगडण्डी के परे, होकर खड़े
हाथ हिलाकर मुझे
जाने के लिए बोल देना
तुम उसे छोड़ देना
क्या उसने कहा था
बेइंतहा प्यार सिर्फ प्यार है
नहीं चाहता कोई शक्ल
कोई रिश्ता कोई आकार
या की ये बहाना है
चाहते नहीं तुम
ज़माने की मंशाओं को तोड़ देना
क्या उसने कहा था
की तुम उसे छोड़ देना  

Saturday, 16 December 2017





मूक-आलाप 


मैं ज़िंदा हूँ
बस मैं ही ज़िंदा हूँ
मालूम ही ना चला
और सब मर गए
सैकड़ो किरदार जो
रहा करते थे मुझमें
कभी अकेला न था
चाहे इर्द गिर्द कोई न हो
जाने कब बहका इस भीड़ से
तमाशे से,
आज याद  किया
तो सब मर चुके थे
क्या बजह रही होगी
भूख से , नहीं उनको तो आदत थी उसकी
घुटन से, नहीं वो तो कही ज्यादा है बाहर
कोई बीमारी, उपेक्षा तो नहीं
पर वो सब इनसे ही तो जन्मे थे
फिर भी मर गए
मैं रोना चाहता हूँ  पर
लोग क्या कहेंगे
या की मैं खुश होऊ
की मैं अभी जिन्दा हूँ
और सब्र करूँ की मरते हैं
हर दिन सैकड़ो
सैकड़ो लोगों के अंदर।


खुद से जज्बातों को खोते जा रहा हूँ
मैं अकेला आज होते जा रहा हूँ। 

Saturday, 28 October 2017

हे ईश्वर मुझे शक्ति दे
कि मैं लड़ पाऊं अपने अंतर्विरोधों से
कि मैं चल पाऊं सही रास्ते पर
और रहू ऊपर उन घरोंदो से
जो तूने बनाये ही नहीं

ईश्वर मुझे विचार दे की कहीं
रुक न जाऊ इस समाज की तरह
जो चाहता है बदलाब
पर होने नहीं देता

मुझे संवेदना दे की मैं हूँ
एक मानव सबसे पहले
किसी के दुःख, भावनाओं और संवेगो को
न देखूँ उसकी सामाजिक स्थिति से

मुझे प्रेम दे जो दे सकू उनको
जिनकी बजह से मैं हूँ
जिनके साथ मैं हूँ
जिसके साथ मैं होना चाहता हूँ

मुझे जीवन दे
जो भले ही छोटा हो पर
हर पल संतुष्टि भरा हो
और न हो कभी अफ़सोस
की काश मैं  इतना मजबूर न होता



Saturday, 21 January 2017


हजार के नोट की व्यथा 


कभी ख्वाहिश था लोगों की
अब मर चुका हूँ, उनकी नजरो में
एक योजित मौत
उन गुनाहों के लिए, जो मैंने किये ही नहीं
की मेरा चरित्र कभी बदला ही नहीं
कभी भी , कही भी
की चाहे रहा, नरम उंगलियो का स्पर्श
या की फिर, सख्त हाथो का अहसास
या घिसी हुई, कमजोर और दरारों वाली
नाजुक हथेलियां
खुश ही रहा, की चाहे कही भी ठूसा गया
या बंधा रहा महीनो, उस साडी के पल्लू से
या हर शख्स के थूक से, स्वागत हुआ
और फिर चला आया, आलिशान कोठी में
हाँ  कभी रोना भी आया
जब पटका गया, टेबलों पर तो कभी निचे से
दिखाया गया, बेइज्जती से
लोकतंत्र के विशाल मंदिर में
कही बेहतर थी वो कच्ची बस्ती
जहा बड़ी इज्जत थी
पर चलता रहा,  जैसी आदत थी
हर जगह रहा मेरा नाम
प्यार-प्रीत में, हार और जीत में
झूठ और फरेब में
राजनीति में, धर्म में
आतंक में, दंगो में
हर गुनाह का मूल बनाया गया मुझे
हर उस शख्स ने  कोसा  मुझे
जिसके पास मैं  नहीं था
पर मैं कहा बदला
कोठों पर उड़ा , मंदिरो में सजा
की कभी बना, भावों का वाहक
लेकर आंसुओ की नमी
बुजुर्ग माँ से बेटी को
क्या क्या नहीं देखा
इंसानियत से हैवानियत तक
सब बदल जाते थे देखकर मुझे
पर मैं नहीं बदला
फिर भी निकाल दिया फरमान
मौत का मेरी
उन गुनाहों के लिए, जो तुम्हारे हैं
मैं तो बस अक्स हूं तुम्हारा
की कर पाओगे अहसास कभी
अपने गुनाहों का
और निकाल पाओगे
फरमान अपने खिलाफ
अपनी मौत का........









मैं जकड़ा हुआ हूँ  जब भी कुछ अलग करना हो  या नया  फिजूल  शख्स दिखते हैं  कि बे क्या कहेंगे  मैं आज़ाद नहीं हूँ   मैं जकड़ा ...